Description
प्रह्लाद महाराज जो केवल पाँच वर्ष के बालक थे, अपने सहपाठीयों को आत्म-साक्षात्कार के दिव्य विज्ञान के विषय में शिक्षा देते हैं, जो उनके नास्तिक पिता हिरण्यकशिपू को बिलकुल पसंद नहीं था। उन्होंने यह ज्ञान अपने गुरु नारद मुनि से प्राप्त किया था, जब वे अपनी माता की कोख में ही थे। इन सार्वभौमिक शिक्षाओं को इस पुस्तिका में संकलित किया गया है, जिससे हमें ध्यान, इन्द्रिय संयम, मन की शान्ति प्राप्त करने की विधि और अन्त में जीवन के सर्वोपरि गन्तव्य – शुद्ध भगवद्प्रेम – को प्राप्त करने का ज्ञान मिलता है।

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